सागर। आपने बिहार के माउंटेन मैन दशरथ मांझी की कहानी तो सुनी होगी जिन्होंने अकेले पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया था अब बुंदेलखंड के सागर जिले से भी संघर्ष और जज्बे की ऐसी ही मिसाल सामने आई है जहां एक आदिवासी मजदूर ने पत्नी-बच्चों की प्यास बुझाने के लिए अकेले ही 50 फीट गहरा कुआं खोद डाला
सागर जिले की नरयावली विधानसभा के इमलिया गांव में रहने वाले 71 वर्षीय अजब सिंह आदिवासी का यह कुआं आज भी पूरे गांव की प्यास बुझा रहा है करीब 45 साल पहले खोदा गया यह कुआं गांव के करीब 300 लोगों के लिए जीवनरेखा बना हुआ है गांव की पुरानी आदिवासी बस्ती में आज भी पेयजल संकट गहराया हुआ है ग्रामीणों के मुताबिक गांव का सरकारी कुआं गर्मियों में सूख जाता है और उसका बचा पानी पीने लायक नहीं रहता नल-जल योजना की टंकी तो बनी लेकिन गांव तक पानी आज तक नहीं पहुंचा ऐसे में पूरे गांव के लिए अजब सिंह का कुआं ही एकमात्र सहारा है
अजब सिंह बताते हैं कि उन्होंने वर्षों पहले गांव में कुआं खुदवाने के लिए प्रशासन से गुहार लगाई थी लेकिन रिश्वत नहीं देने पर कोई मदद नहीं मिली इसी बीच पानी भरने गई उनकी पत्नी सदा रानी को रिश्तेदारों के यहां अपमानित होकर लौटना पड़ा इस घटना ने अजब सिंह को भीतर तक झकझोर दिया पेशे से मजदूर अजब सिंह ने तब ठान लिया कि अब वे खुद ही अपने घर के पास कुआं खोदेंगे दिनभर मजदूरी कर परिवार का पेट पालते और बचा हुआ समय कुआं खोदने में लगाते करीब दो साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने अकेले ही 50 फीट गहरा कुआं तैयार कर पानी निकाल लिया अजब सिंह की पत्नी सदा रानी बताती हैं कि वह समय बेहद कठिन था कई बार परिवार को भूखे पेट सोना पड़ता था और कभी नाली का पानी पीकर प्यास बुझानी पड़ती थी लेकिन अजब सिंह ने हार नहीं मानी और आखिरकार पूरे परिवार के लिए पानी का इंतजाम कर दिया आज गांव के लोग खुले दिल से इस कुएं का पानी इस्तेमाल करते हैं अजब सिंह का परिवार किसी को भी पानी भरने से नहीं रोकता हालांकि अब इस कुएं का पानी भी मैला होने लगा है लेकिन गांव में दूसरा कोई विकल्प नहीं है ग्रामीणों का कहना है कि बच्चियां स्कूल छोड़कर पानी ढोने को मजबूर हैं 71 साल की उम्र में भी अजब सिंह संघर्ष कर रहे हैं उनकी झोपड़ी जर्जर हो चुकी है तीन साल तक आवास योजना का लाभ पाने के लिए भटकने के बाद अब वे खुद ही मिट्टी और ईंटों से अपने लिए छोटा सा आशियाना बना रहे हैं इमलिया गांव की यह कहानी सिर्फ एक कुएं की नहीं बल्कि उस संघर्ष की मिसाल है जहां एक व्यक्ति ने प्रशासनिक बेरुखी के सामने हार मानने के बजाय अपनी मेहनत से पूरे गांव के लिए उम्मीद का स्रोत तैयार कर दिया।
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