डॉ.हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के ललितकला एवं प्रदर्शनकारी कला विभाग में व्याख्यान श्रृंखला का शुभारंभ

सागर।डॉ.हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर के ललितकला एवं प्रदर्शनकारी कला विभाग में आज से “शोध प्राविधि” विषय पर व्याख्यान श्रृंखला का शुभारंभ हुआ इस श्रृंखला के प्रथम व्याख्यान का विषय था ललितकला एवं प्रदर्शनकारी कलाओं में शोध हेतु शोध प्राविधि कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन मुख्य वक्ता डॉ. दिवाकर कुमार झा (सहायक प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान एवं लोक प्रशासन विभाग)विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ.राकेश सोनी,डॉ.सुप्रभा दास अल्ताफ मुलानी, कार्यक्रम के संयोजक डॉ.नीरज उपाध्याय,आकाश मालवीय तथा द्वारा किया गया मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता डॉ.दिवाकर कुमार झा का सम्मान विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. राकेश सोनी एवं डॉ. सुप्रभा दास ने किया अपने व्याख्यान में डॉ. झा ने सामाजिक विज्ञान के शोध की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शोध तभी सार्थक होता है जब उसमें अंतर्विषयक दृष्टिकोण हो आज कला केवल रंग और रेखाओं की अभिव्यक्ति नहीं है,बल्कि यह समाजशास्त्र राजनीति, मनोविज्ञान और सांस्कृतिक अध्ययन से गहराई से जुड़ी हुई हैउन्होंने शोध प्राविधि की व्याख्या करते हुए बताया कि कला एवं प्रदर्शनकारी कलाओं में शोध केवल सौंदर्यशास्त्र या तकनीक तक सीमित नहीं है,बल्कि यह सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का भी गहन अध्ययन करता है NEP 2020 के परिप्रेक्ष्य ने हमें सिखाया कि शोध को बहु-विषयक होना ही होगा आज यदि कला को हम समाजशास्त्र,राजनीति और संस्कृति के संदर्भ में देखें तो यह शोधार्थियों के लिए नई दृष्टि प्रदान करेगा
कार्यक्रम में डॉ.नीरज उपाध्याय ने शोध की आवश्यकता और इसके व्यापक आयामों पर अपने विचार साझा किए डॉ. सुप्रभा दास ने कलाओं में शोध प्राविधि की चुनौतियों और संभावनाओं पर प्रकाश डाला वहीं आकाश मालवीय ने शोध की सामाजिक और सांस्कृतिक प्रासंगिकता को रेखांकित किया इस अवसर पर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. विवेक जायसवाल डॉ.अवधेश तोमर डॉ.राहुल स्वर्णकार सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे कार्यक्रम का सफल संयोजन एवं संचालन डॉ. नीरज उपाध्याय और आकाश मालवीय ने किया व्याख्यान के अंत में सभी वक्ताओं ने यह विश्वास व्यक्त किया कि यह श्रृंखला शोधार्थियों और विद्यार्थियों को शोध की नयी पद्धतियों और अंतर्विषयक दृष्टिकोण से अवगत कराएगी, जिससे कला और समाज दोनों का गहन अध्ययन संभव होगा।

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