ललित कला एवं प्रदर्शनकारी कला विभाग में ‘रागरंग संवाद’ प्रस्तुतिपरक व्याख्यान का सफल आयोजन

सागर.डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के ललित कला एवं प्रदर्शनकारी कला विभाग में एक अद्वितीय और बहुआयामी सांस्कृतिक आयोजन ‘रागरंग संवाद’ का सफल आयोजन हुआ यह कार्यक्रम केवल एक व्याख्यान या प्रदर्शन न होकर एक समग्र कलानुभव था जिसमें शास्त्रीय संगीत ध्रुपद-ख्याल रंगमंच और चित्रकला एक-दूसरे से संवाद करते हुए दर्शकों को एक नवीन अनुभूति से संपृक्त कर गए कार्यक्रम का केंद्र विषय था ध्वनि से दृश्य तक रंगमंच और चित्रकला में शास्त्रीय संगीत की अनुक्रिया जिसे प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक पियूष दीक्षित हैदराबाद ने नाट्यशास्त्र, ध्रुपद और ख्याल के शास्त्रीय और समकालीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया उन्होंने बताया कि संगीत केवल श्रवण का माध्यम नहीं, बल्कि दृश्य रचना की आधारभूमि भी है जहाँ राग, रंग में रूपांतरित होकर मंच पर दृश्य का आकार लेता है कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन से हुआ जिसमें विभागाध्यक्ष डॉ.बलवंत सिंह भदौरिया,अकादमिक निदेशक प्रो.नवीन कानगो डॉ.अवधेश सिंह तोमर एवं डॉ.राहुल स्वर्णकार डॉ. नीरज उपाध्याय और आकाश मालवीय ने सहभागिता निभाई तत्पश्चात पियूष दीक्षित ने अपने संगीतात्मक वक्तव्य में यह दर्शाया कि कैसे ध्रुपद की गंभीरता और ख्याल की कल्पनाशीलता,मंच और चित्रकला के भीतर गहन भाव-संवाद रचते हैं दीक्षित ने पहाड़ी, राजस्थानी और मुग़ल मिनिएचर चित्रशैलियों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि राग केवल ध्वनि नहीं, बल्कि रंग, रूप और रसायन की दृश्यात्मक संकल्पना भी है उन्होंने कहा, ‘जब राग रंग में उतरता है, तो वह केवल संगीत नहीं, एक दृश्य-अनुभव बन जाता है कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन डॉ. नीरज उपाध्याय और आकाश मालवीय ने किया, जिससे आयोजन औपचारिकता से परे एक जीवंत कला-अनुभव बन गया कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे निदेशक, आकादमिक मामले प्रो.नवीन कानगो ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि  ‘रागरंग संवाद’ इस बात का प्रतीक बना कि जब विभिन्न कलाएं एक-दूसरे से संवाद करती हैं, तो वे सीमाओं से परे जाकर संवेदनशीलता और सौंदर्यबोध का नया संसार रचती हैं यह आयोजन विश्वविद्यालय के कला परिसर में एक स्मरणीय सांस्कृतिक हस्ताक्षर के रूप में दर्ज हो गया है जहाँ ध्वनि, दृश्य और रंग ने मिलकर कला की एक नई भाषा गढ़ी
संगीत सत्र में हेमेन्द्र राजपूत तबला और कु.स्तुति खम्परिया हार्मोनियम की संगत ने प्रस्तुति को भावनात्मक गहराई दी, जिससे यह गायन एक पूर्ण मंचीय रचना बन गया कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षकगण डॉ. राकेश सोनी, डॉ. दिवाकर झा, डॉ. सुप्रभा दास, अल्ताफ मुलानी, डॉ विवेक जायसवाल सहित अनेक शोधार्थी, छात्र-छात्राएँ एवं कलाप्रेमी उपस्थित रहे सभी ने इस कार्यक्रम को कलाओं के मध्य संवाद और नवचिंतन की प्रेरक यात्रा के रूप में देखा।

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