सागर.डॉ.हरीसिंह विश्वविद्यालय सागर में डॉ.भीमराव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर डॉ.आंबेडकर चेयर के तत्त्वावधान में विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया.आयोजन में मुख्या वक्ता भारत सरकार के संचार मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी डॉ.दिलीप सिंह थे. अध्यक्षता प्रभारी कुलपति प्रो.वाय एस ठाकुर ने की. स्वागत भाषण देते हुए डॉ.अम्बेडकर चेयर के प्रभारी प्रो. राजेश गौतम ने संविधान के प्रस्तावना का वाचन कराया. डॉ.दिलीप सिंह ने कहा कि बाबा साहब ने ऐसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आन्दोलन चलाया जो सामाजिक और पारंपरिक प्रथाओं के नाम की जा रही थी.सती प्रथा,अपृश्यता, बाल विवाह जैसी अमानवीय प्रथाएं संस्कृति के नाम पर की जा रही थीं.एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था जो मानवीय गरिमा के विरुद्ध थी, डॉ.आंबेडकर ने उसके उन्मूलन के लिएआजीवन प्रयास किया.डॉ.अम्बेडकर सामाजिक बदलाव चाहते थे.उनका मानना था कि जाति की समस्या मानसिक समस्या है जिसे जन्म से जोड़कर देखा जाने लगा.वे वैचारिक स्वतंत्रता, स्वतंत्र अभिव्यक्ति, वैयाक्तिक स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार, मानवीय गरिमा के पक्षधर थे. पूरे विश्व में उन्होंने इसके लिए लड़ाई लड़ी.उन्होंने इस सम्बन्ध में गांधी,अम्बेडकर और सावरकार के विचारों का भी उल्लेख किया.उन्होंने कहा कि डॉ.आंबेडकर चातुर्वर्ण व्यवस्था पर प्रहार करना चाहते थे क्योंकि उनका मानना था कि मानवीय गरिमा को बनाए और बचाए रखने के लिए वर्ण व्यवस्था का समाप्त होना आवश्यक है.
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुये प्रभारी कुलपति प्रो. वाय.एस. ठाकुर ने कहा कि दुनिया के कई विकसित देशों में सरनेम की उपयोग कम किया जाता है इसलिए ऐसे देशों में जातिवाद की समस्या कम पाई जाती है. जाति की पहचान अज्ञानता के कारण है. यदि मनुष्य और समाज विकसित एवं ज्ञान आधारित होगा तो वह अपनी पहचान को अपनी प्रतिभा, कर्म एवं व्यक्तित्व से निर्मित करेगा. शैक्षिक उन्नयन से ही जातिविहीन समाज की संकल्पना संभव है.
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