विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र विभाग में भारतीय दार्शनिक दिवस का आयोजन

सागर।डॉ.हरीसिंह गौर विश्व विद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में भारतीय दार्शनिक दिवस का आयोजन दो सत्रों में किया गया आदि गुरू शंकराचार्य की जयंती के उपलक्ष्य में विभागाध्यक्ष डॉ.अनिल कुमार तिवारी के निर्देशन में अयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य विषय था आंतरिक शांति एवं सामंजस्य की प्राप्ति के पथ के रूप में भारतीय दर्शन कार्यक्रम की अध्यक्षता मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान अध्ययनशाला के अधिष्ठता प्रो. नागेश दुबे ने की सुबह 11 बजे से आयोजित प्रथम सत्र में संत-समागम हुआ जिसमें स्वा्मीनारायण गुरूकुलम राजकोट गुजरात से पधारे संतों का समागम हुआ स्वामी स्वरूपदास महाराज, स्वामी मुकुंद स्वारूप मुम्बाई वात्सल्य स्वाामी मुम्बई का दर्शनशास्त्र् विभाग में शुभागमन हुआ स्वागत उद्बोधन दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ.अनिल कुमार तिवारी ने दिया उन्होंने अपने उद्बोधन में दर्शनशास्त्र विभाग में सभी का हार्दिक स्वागत करते हुए बताया कि भारतीय दर्शन एक दर्शन नहीं अनेक दृष्टियों का समागम है स्वा‍मी स्वरूपदास महाराज ने बतलाया कि वेदान्त की परम्परा में ही स्वामीनारायण सम्प्रदाय की स्थापना हुई उन्होंने पेट, बेट और ठेट के द्वारा पेट भरने से ईश्वर प्राप्ति की बात सरल शब्दों में बतलाई संत समागम में डॉ. शशिकुमार सिंह, संस्कृत विभाग की प्रमुख भूमिका रही द्वितीय सत्र मेंआमंत्रित वक्ता वैदिक अध्ययन विभाग से डॉ.आयुष गुप्ता संस्कृत विभाग से डॉ.नौनिहाल गौतम डॉ.किरण आर्या एवं डॉ.शशिकुमार सिंह रहे सारस्वत अतिथि के रूप में वक्ताा रहे इतिहास विभाग के प्रो.बी.के. श्रीवास्तव सभी वक्ताओं ने भारतीय दर्शन में निहित आंतरिक शांति एवं सामंजस्य के तत्त्वोंे को अपने-अपने ढंग से उजागर किया वैदिक अध्ययन विभाग के द्वारा आदि गुरू शंकर का चित्र व कुछ साहित्य दर्शनशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष को भेंट किया गया वैदिक अध्ययन के छात्र जितेन्द्र द्वारा अद्वैत जागरण शिविर के विषय में जानकारी दी गई इसके पूर्व आदि गुरू शंकराचार्य की जयंती के अवसर पर दर्शनशास्त्र विभाग में कार्यक्रम के मुख्य विषय पर एक निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन 21 अप्रैल 2026 को किया गया था अध्यक्षीय उद्बोधन के पूर्व प्रतिभागियों को पुरस्कृुत किया गया जिसमें प्रथम पुरस्कार अर्पित नायक, द्वितीय पुरस्कार स्नेहा मौर्य एवं तृतीय पुरस्कार उत्कर्ष विश्विकर्मा को प्राप्त हुआ सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किये गए अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रो. नागेश दुबे ने कहा कि जब अहं समाप्त होता है तो ज्ञान की प्राप्ति होती है इसी जगत में स्वर्ग है, इसी जगत में नर्क है संतोष धन सबसे बड़ा धन है आंतरिक शांति के लिए संतोष होना आवश्यक है 
कार्यक्रम का संचालन डॉ. सत्यनारायण देवलिया ने किया आभार प्रदर्शन डॉ. अर्चना वर्मा ने किया इस अवसर पर दर्शनशास्त्र विभाग के शिक्षक डॉ. देबस्मिता चक्रबर्ती, डॉ.नरेन्द्र कुमार बौद्ध के साथ शोधार्थी डॉ.मनोहरलाल चौरसिया डॉ.अभय, शिवकुमार यादव, गौरव कुमार मयंक विनायक राय,अक्षरा सिंघई एवं स्नातक, परास्नातक के छात्र-छात्रा उपस्थित रहे। 

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