डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के समाजविज्ञान शिक्षण अधिगम केंद्र द्वारा सावित्री बाई फुले की प्रतिमा पर माल्यार्पण कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला के तहत पांचवां ऑनलाइन व्याख्यान आयोजित किया गया. जिसका विषय भारतीय ज्ञान परम्परा की सार्वभौमिक प्रासंगिकता था.कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पूर्व संसद सदस्य एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् नई दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने अपने बीज वक्तव्य में देश की राजनैतिक आजादी के पूर्व एवं पश्चात भारतीय ज्ञान परम्परा की स्थिति एवं उसके मुख्य पक्षों पर प्रकाश डाला.डॉ. सहस्त्रबुद्धे ने बताया कि भारत सदियों से ही ज्ञान, दर्शन, योग,अध्यात्म,चिकित्सा,विज्ञान,गणित,मानविकी एवं समाजविज्ञान,भाषा एवं व्याकरण,शिल्प एवं कला तथा संस्कृति के क्षेत्र में समृद्ध रहा है.किन्तु आजादी के पूर्व अंग्रेज़ी ताकतों ने उसको सिरे से खारिज नजरअंदाज करके एक मैकाले केन्द्रित शिक्षा प्रणाली’ में तब्दील कर दिया.लेकिन वर्तमान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 जैसे महत्वपूर्ण सरकारी नीतिगत प्रयास के जरिये हमारे द्वारा अपनी पुरातन ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने की तरफ बढ़या गया कदम आजादी के अमृत महोत्सव का सही मायने में परिचायक है.क्योंकि यह न केवल अपनी प्राचीन ज्ञान विरासत का गुणगान है बल्कि यह हमें वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने एवं भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार तथा निर्देशित भी करता है. इसलिए पुरातन ज्ञान के आधार पर एवं उसका उपयोग करते हुए नवीन ज्ञान पद्धति को गढ़ा जाना मौजूदा समय की प्राथमिक आवश्यकता है.
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