विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयन्ती सभागार में तीसरे दिन सात नाट्य प्रस्तुतियां हुईं. रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ने गरीबी का जीवन जी रहे एक अपाहिज लड़के को परिवार और समाज द्वारा बोझ के रूप में देखे जाने की मार्मिक कहानी को दर्शाया.आईटीएम विश्वविद्यालय, ग्वालियर ने महाभारत के पात्र कर्ण के उदाहरण के माध्यम से जाति व्यवस्था, पक्षपात और भाई-भतीजावाद पर प्रहार किया।अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा ने समाज में गालियों के बढ़ते चलन और उनके दुष्प्रभाव को हास्यपूर्ण ढंग से उजागर किया। गालियों के स्थान पर कुत्ते के भौंकने की आवाज का प्रयोग एक रचनात्मक तत्व था। राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय,भोपाल ने महाभारत की पृष्ठभूमि पर आधारित प्रस्तुति में युद्ध के दौरान पांडवों और कौरवों की सेनाओं में लड़ते हुए एक ही परिवार के दो बेटों की मृत्यु को दिखाया।इसके माध्यम से धर्म और अधर्म के द्वंद्व को उकेरा गया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय,वाराणसी ने भारत विभाजन की त्रासदी को सआदत हसन मंटो की कहानियों के माध्यम से मंच पर जीवंत किया.विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के छात्रों ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के विचार,सती प्रथा और विकसित भारत के विषयों को मंच पर प्रस्तुत किया। यह नाटक भारत के विकास और नाटकों की महत्ता पर आधारित था। डॉ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर ने गिरिश कर्नाड के प्रसिद्ध नाटक ‘हयवदन’ पर प्रस्तुति दी जिसमें बुंदेलखंड के सांस्कृतिक तत्वों जैसे बुंदेली बोली, संगीत का उपयोग कर प्रस्तुति को मनोरंजक तरीके से पेश किया गया। संचालन डॉ. नीरज उपाध्याय ने किया. दो दिवसीय वन-एक्ट नाटकों की यह प्रतियोगिता युवाओं की रचनात्मकता और अभिनय कौशल का बेहतरीन मंच साबित हुई। दोनों दिनों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को न केवल मनोरंजन किया, बल्कि समाज के विभिन्न मुद्दों पर सोचने को भी विवश किया।
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