सागर में रचा गया आस्था भव्यता और दिव्यता का इतिहास परम पूज्य श्री रावतपुरा सरकार महाराज श्री के पावन सान्निध्य में सम्पन्न हुआ

सागर।पावन धरा ने एक ऐसे ऐतिहासिक अलौकिक और अभूतपूर्व आध्यात्मिक आयोजन का साक्षात्कार किया जिसने सनातन संस्कृति की विराटता वैदिक परंपरा की दिव्यता और सामूहिक आस्था की अद्भुत शक्ति को विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर दिया परम पूज्य श्री रावतपुरा सरकार महाराज श्री के पावन सान्निध्य एवं दिव्य मार्गदर्शन में श्री रावतपुरा सरकार आश्रम, वेदांती परिसर,धर्मश्री स्थित मंशापूर्ण बालाजी मंदिर परिसर में आयोजित "माँ राजराजेश्वरी हरिद्रा कोटि कुमकुमार्चन" महाअनुष्ठान ने भव्यता और दिव्यता का ऐसा अद्वितीय संगम प्रस्तुत किया जिसे उपस्थित श्रद्धालु जीवनभर विस्मृत नहीं कर पाएंगे लगभग एक माह से चल रही सतत तैयारियों ने इस आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया दिन-रात हजारों स्वयंसेवक,आचार्य,साधक और आयोजन से जुड़े कार्यकर्ता सेवा और समर्पण की भावना से जुटे रहे विशाल यज्ञशाला का निर्माण,भव्य मंडपों की स्थापना हजारों श्रद्धालुओं के लिए आवास पेयजल,चिकित्सा,पार्किंग,सुरक्षा,यातायात,पूजन सामग्री और वैदिक अनुष्ठानों की सूक्ष्मतम व्यवस्थाएँ निरंतर युद्धस्तर पर की गईं 
लगभग 20 एकड़ में विस्तृत परिसर को इस प्रकार सजाया गया कि प्रत्येक दिशा में आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक वैभव का अद्भुत समन्वय दिखाई दे रहा था 29 जुलाई की प्रातः बेला से ही सागर की ओर आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ पड़ा कि आयोजन स्थल तक पहुँचने वाले मार्गों पर कई किलोमीटर लंबी वाहनों और श्रद्धालुओं की कतारें दिखाई देने लगीं मध्यप्रदेश सहित उत्तरप्रदेश,छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र,राजस्थान,गुजरात दिल्ली,हरियाणा तथा देश के अनेक राज्यों से श्रद्धालु अपने परिवारों सहित इस दिव्य महाअनुष्ठान में सम्मिलित होने पहुँचे अनुमानतः लगभग 50 हजार श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक आयोजन में सहभागिता कर माँ राजराजेश्वरी के श्रीचरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित की यज्ञभूमि में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं का स्वागत भव्य वैदिक वातावरण, सुव्यवस्थित व्यवस्थाओं विशाल मंडपों,अलंकृत वेदियों,दिव्य श्री यंत्र,पुष्पों की सुगंध दीपों की पंक्तियों और वैदिक मंत्रों की अनुगूँज ने किया 
1100 वैदिक आचार्यों द्वारा एक साथ उच्चारित वेदमंत्रों ने सम्पूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक चेतना से स्पंदित कर दिया शंखनाद,घंटानाद,डमरुओं का प्रचंड निनाद और "जय माँ राजराजेश्वरी" के गगनभेदी उद्घोष ने सम्पूर्ण परिसर को देवमय बना दिया इस महाअनुष्ठान की सबसे विशिष्ट विशेषता रही माँ राजराजेश्वरी हरिद्रा कोटि कुमकुमार्चन,जिसमें माँ को अतिप्रिय हरिद्रा (हल्दी) और आदिशक्ति के चैतन्य का प्रतीक कुमकुम करोड़ों अर्चनों के माध्यम से अर्पित किया गया यह केवल पूजन नहीं बल्कि लोकमंगल,विश्वशांति सुख-समृद्धि और समस्त मानवता के कल्याण का सामूहिक वैदिक संकल्प था इस ऐतिहासिक आयोजन के लिए देश के विभिन्न भागों से पूजन सामग्री विशेष रूप से मंगाई गई देवास से 100 क्विंटल पवित्र हरिद्रा,नेपाल से रुद्राक्ष,दिल्ली से फल,पुष्प एवं 11 हजार कमल पुष्प सूरत से 11 हजार साड़ियाँ एवं माँ के श्रृंगार के वस्त्र, कानपुर से सरसों का तेल,उड़ीसा से 31 हजार नारियल वाराणसी से कुश,पवित्री,सुपारी,हवन सामग्री,कलावा शहद एवं श्रृंगार सामग्री,हरिद्वार से गंगाजल,बरमान से माँ नर्मदा का पावन जल,इंदौर से शक्कर,नागपुर से किशमिश छत्तीसगढ़ से चावल,बेंगलुरु से रजत मुद्राएँ, नौगाँव से हजारों कलश एवं एक लाख दीप,तथा देशभर से लगभग दो करोड़ बिल्वपत्र इस महाअनुष्ठान के लिए एकत्र किए गए इसके अतिरिक्त सवा लाख बूंदी के लड्डू, 11 टन आम, 11 टन केले, 11 क्विंटल बताशे, 5 क्विंटल पेठा,एक लाख बीड़ा पान,एक लाख खुले पान, 15 हजार नारियल, 11 क्विंटल किशमिश सहित असंख्य पूजन सामग्री माँ के श्रीचरणों में समर्पित की गई यह दृश्य ऐसा प्रतीत करा रहा था मानो सम्पूर्ण भारत की श्रद्धा एक ही यज्ञभूमि पर एकत्रित हो गई हो महाअनुष्ठान के शुभारंभ से पूर्व परम पूज्य श्री रावतपुरा सरकार महाराज श्री का दिव्य आगमन हजारों डमरुओं,शंखों,पुष्पवर्षा और जयघोष के मध्य हुआ श्रद्धालुओं ने करबद्ध होकर अपने आराध्य का स्वागत किया जैसे ही महाराज श्री यज्ञमंडप में पहुँचे सम्पूर्ण वातावरण "जय माँ राजराजेश्वरी" के उद्घोष से गूँज उठा और वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य महाअनुष्ठान का शुभारंभ हुआ लगभग ढाई घंटे तक चले इस विराट अर्चन में हजारों श्रद्धालुओं ने पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ सहभागिता की प्रत्येक अर्चन के साथ केवल हरिद्रा और कुमकुम ही नहीं,बल्कि प्रत्येक श्रद्धालु की कामना विश्वास,परिवार का मंगल,राष्ट्र की समृद्धि और विश्वकल्याण का संकल्प भी माँ राजराजेश्वरी के श्रीचरणों में समर्पित होता रहा सायंकाल सम्पन्न हुई भव्य महाआरती इस आयोजन का चरम क्षण सिद्ध हुई एक लाख दीपों की ज्योति से आलोकित सम्पूर्ण यज्ञभूमि वैदिक ऋचाओं की अनुगूँज,शंखों का महाघोष,डमरुओं का प्रचंड निनाद और हजारों श्रद्धालुओं द्वारा एक स्वर में गाए जा रहे आरती के स्वर ने ऐसा अलौकिक वातावरण निर्मित किया कि उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति भावविभोर हो उठा अनेक श्रद्धालुओं की आँखें नम थीं और उनके मुख पर आत्मिक शांति एवं आनंद स्पष्ट दिखाई दे रहा था
इस अवसर पर परम पूज्य श्री रावतपुरा सरकार महाराज श्री ने अपने मंगल संदेश में कहा कि माँ राजराजेश्वरी की उपासना केवल व्यक्तिगत समृद्धि का माध्यम नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व के कल्याण धर्म की प्रतिष्ठा मानवता की उन्नति और लोकमंगल का दिव्य संकल्प है उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से सेवा,संस्कार,सदाचार और सनातन मूल्यों को अपने जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया
सागर की इस पुण्यभूमि पर सम्पन्न हुआ "माँ राजराजेश्वरी हरिद्रा कोटि कुमकुमार्चन" केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा बल्कि सनातन संस्कृति के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में स्थापित हो गया भव्यता,दिव्यता,अनुशासन,वैदिक परम्परा और जनसहभागिता का यह अद्वितीय संगम आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा तथा यह संदेश देता रहेगा कि जब आस्था,सेवा और संकल्प एक साथ खड़े होते हैं तब इतिहास केवल लिखा नहीं जाता,रचा जाता है।

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